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रुद्रप्रयाग : उत्तराखंड की वीर भूमि से जुड़ी एक प्रेरणादायक कहानी करीब 112 साल बाद फिर सामने आई है। रुद्रप्रयाग जिले के राइफलमैन बहादुर सिंह रावत की शहादत अब सेना के रिकॉर्ड और ऐतिहासिक दस्तावेजों के जरिए प्रमाणित हुई है। प्रथम विश्व युद्ध में देश की रक्षा करते हुए उन्होंने अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे….लेकिन लंबे समय तक उनका बलिदान इतिहास के पन्नों में दबा रहा।

जानकारी के अनुसार बहादुर सिंह रावत का जन्म वर्ष 1880 में रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि क्षेत्र के ग्राम फलई तल्ला कालीफाट में हुआ था। उन्होंने वर्ष 1901 में मात्र 21 साल की उम्र में रॉयल गढ़वाल राइफल्स में भर्ती होकर सेना की वर्दी पहनी और देश सेवा का संकल्प लिया।

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वर्ष 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने पर उनकी बटालियन को फ्रांस भेजा गया। 7 नवंबर 1914 को फ्रांस के यप्रेस क्षेत्र में हुए भीषण युद्ध के दौरान उन्होंने बहादुरी से लड़ते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।

उनकी वीरता के सम्मान में उस समय ब्रिटिश सरकार ने परिवार को वीर स्मृति पदक’ प्रदान किया था। हालांकि सीमित रिकॉर्ड और जानकारी के कारण उनकी शौर्यगाथा व्यापक रूप से सामने नहीं आ सकी। अब सेना के अभिलेखों और ऐतिहासिक दस्तावेजों से उनकी शहादत की पुष्टि हो गई है।

सेना के रिकॉर्ड के अनुसार राइफलमैन बहादुर सिंह रावत का नाम लैंसडाउन युद्ध स्मारक नई दिल्ली स्थित इंडिया गेट और फ्रांस के न्यू चैपल युद्ध स्मारक पर सम्मानपूर्वक दर्ज है।

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यह ऐतिहासिक जानकारी सामने आने के बाद रुद्रप्रयाग और पूरे उत्तराखंड में गर्व का माहौल है। लैंसडाउन छावनी के स्टेशन कमांडर ब्रिगेडियर विनोद सिंह नेगी ने शहीद के परिजनों को सम्मानित कर श्रद्धांजलि दी।

शहीद के परिवार की तीसरी पीढ़ी के सदस्य प्रमोद रावत, मोहित रावत और प्रदीप रावत को जब पुराने दस्तावेज और वीर स्मृति पदक मिले…तो उन्होंने सेना से संपर्क किया। जांच के बाद बहादुर सिंह रावत की शहादत से जुड़े सभी रिकॉर्ड सामने आए।

परिजनों ने सरकार से मांग की है कि गांव या क्षेत्र में शहीद बहादुर सिंह रावत की स्मृति में एक स्मारक बनाया जाए…ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके बलिदान और देशभक्ति से प्रेरणा ले सकें।